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SIR विरोध पर सख्ती, मालदा हिंसा केस में NIA की जांच तेज

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पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया के विरोध के बाद मालदा हिंसा मामले में NIA ने जांच तेज कर दी है। न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाए जाने के आरोप में कई बीएलओ से पूछताछ हो रही है, वहीं कोलकाता में प्रदर्शन करने वाली महिला बीएलओ के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज की गई है।

कोलकाता/आलम की खबर: पश्चिम बंगाल में SIR (Special Intensive Revision) को लेकर शुरू हुआ विवाद अब केवल राजनीतिक या प्रशासनिक बहस तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह कानून-व्यवस्था और जांच एजेंसियों के दायरे में तेजी से प्रवेश कर चुका है। मालदा जिले में SIR प्रक्रिया के विरोध के दौरान न्यायिक अधिकारियों को घेरने और कथित तौर पर बंधक बनाए जाने की घटना ने पूरे मामले को बेहद गंभीर बना दिया है। इसी के बाद अब राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने अपनी जांच तेज कर दी है और घटनाक्रम से जुड़े लोगों से लगातार पूछताछ की जा रही है। दूसरी ओर, कोलकाता में मुख्य चुनाव अधिकारी कार्यालय के सामने विरोध प्रदर्शन करने के मामले में एक महिला BLO के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने से यह विवाद और गहरा गया है।

सूत्रों के अनुसार, मालदा में हुई घटना की जांच के तहत करीब 40 बीएलओ को तलब किया गया है, जिनमें से रविवार तक 22 लोगों से पूछताछ की जा चुकी है। यह पूछताछ मालदा में बनाए गए एनआईए के अस्थायी कैंप कार्यालय में की गई। जांच एजेंसी की टीम एक बार फिर मोथाबाड़ी स्थित बीडीओ कार्यालय भी पहुंची, जहां उस दिन न्यायिक अधिकारियों को घंटों तक घेरकर रखे जाने का आरोप है। अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर पूरे घटनास्थल का निरीक्षण किया और यह समझने की कोशिश की कि आखिर उस दिन घटनाक्रम किस तरह आगे बढ़ा और भीड़ का नियंत्रण क्यों टूट गया।

बताया जा रहा है कि एनआईए ने इस मामले की जांच को तीन हिस्सों में बांटकर आगे बढ़ाना शुरू किया है। एक टीम बीडीओ कार्यालय से जुड़े तथ्यों को खंगाल रही है, दूसरी टीम घटनास्थल पर मौजूद हालात और स्थानीय कड़ियों को समझ रही है, जबकि तीसरी टीम थाना स्तर पर दर्ज सूचनाओं, बयान और रिकॉर्ड की पड़ताल में जुटी है। एजेंसी यह जानने की कोशिश कर रही है कि उस दिन भीड़ कैसे जमा हुई, उसे किसने उकसाया या नेतृत्व किया, और न्यायिक अधिकारियों को घेरने जैसी गंभीर स्थिति आखिर कैसे पैदा हुई। शुरुआती जांच में यह आशंका भी जताई जा रही है कि यह सिर्फ अचानक भड़की भीड़ नहीं, बल्कि इसके पीछे किसी संगठित साजिश की संभावना भी हो सकती है।

मालदा के मोथाबाड़ी और कालियाचक इलाके में पिछले दो दिनों से जांच का दायरा लगातार बढ़ाया गया है। टीम ने इंग्लिशबाजार थाना क्षेत्र में भी जाकर कई अहम सुराग जुटाने की कोशिश की। यहां सीसीटीवी फुटेज खंगाले गए, आसपास के लोगों से बातचीत की गई और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान दर्ज किए गए। एजेंसी के लिए यह पता लगाना बेहद अहम है कि घटनास्थल पर मौजूद लोग स्वतः इकट्ठा हुए थे या उन्हें संगठित तरीके से बुलाया गया था। जांच एजेंसियों की नजर अब इस बात पर भी है कि प्रदर्शन और हिंसक तनाव के बीच कौन-कौन लोग सक्रिय भूमिका में थे।

इस पूरे मामले में मुख्य आरोपी मोफक्करुल इस्लाम की गिरफ्तारी पहले ही हो चुकी है। उसके बाद से जांच एजेंसियां बाकी संभावित कड़ियों को जोड़ने में जुटी हैं। माना जा रहा है कि शुरुआती स्तर पर जो जानकारी सामने आई है, उसके आधार पर आगे और लोगों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है। सूत्रों के मुताबिक, एनआईए अपनी प्राथमिक रिपोर्ट जल्द अदालत में पेश करने की तैयारी कर रही है। यह रिपोर्ट आने वाले दिनों में इस मामले की दिशा और गंभीरता दोनों को और स्पष्ट कर सकती है।

इधर, इस पूरे विवाद के समानांतर कोलकाता में भी प्रशासनिक और राजनीतिक तनाव बढ़ गया है। मुख्य चुनाव अधिकारी (CEO) कार्यालय के सामने विरोध प्रदर्शन करने के आरोप में एक महिला बीएलओ तनुश्री मोदक भट्टाचार्य के खिलाफ पुलिस ने एफआईआर दर्ज की है। जानकारी के अनुसार, यह कार्रवाई चुनाव आयोग के निर्देश पर की गई है। तनुश्री को हरे स्ट्रीट पुलिस स्टेशन में नोटिस भेजा गया है और उन्हें नोटिस मिलने के तीन दिनों के भीतर पेश होने के लिए कहा गया है। यह कदम इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि SIR प्रक्रिया शुरू होने के बाद से बीएलओ समुदाय के बीच कार्यभार और दबाव को लेकर असंतोष खुलकर सामने आता रहा है।

नोटिस में महिला बीएलओ को स्पष्ट रूप से निर्देश दिया गया है कि वह जांच में हर संभव सहयोग करें, संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराएं और मामले से जुड़े किसी भी सबूत के साथ छेड़छाड़ या उसे नष्ट करने जैसी गतिविधियों से दूर रहें। साथ ही, पुलिस ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि जांच में सहयोग नहीं किया गया या निर्देशों का पालन नहीं हुआ, तो गिरफ्तारी जैसी कार्रवाई भी की जा सकती है। इस नोटिस ने राज्य में BLO समुदाय के भीतर और ज्यादा बेचैनी बढ़ा दी है, क्योंकि इसे कई लोग प्रशासनिक दबाव के रूप में भी देख रहे हैं।

दरअसल, पिछले साल नवंबर के आसपास जब बंगाल में SIR प्रक्रिया को लेकर जमीनी स्तर पर गतिविधियां तेज हुई थीं, तभी से कई BLO खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर करने लगे थे। तृणमूल समर्थित BLO अधिकार संरक्षण समिति ने आरोप लगाया था कि बीएलओ पर जरूरत से ज्यादा काम का दबाव डाला जा रहा है और यह जिम्मेदारी कई स्तरों पर असंतुलित हो चुकी है। समिति ने यहां तक दावा किया था कि अत्यधिक कार्यभार और मानसिक दबाव के कारण कुछ BLO ने आत्महत्या जैसे गंभीर कदम भी उठाए। इन्हीं आरोपों और नाराजगी के बीच CEO कार्यालय के सामने धरना-प्रदर्शन का सिलसिला शुरू हुआ था, जो बाद में राजनीतिक रंग भी लेने लगा।

इस विवाद ने उस समय और तूल पकड़ लिया था, जब 24 फरवरी को CEO कार्यालय के बाहर चल रहे धरने के दौरान विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी वहां पहुंचे थे। उस दौरान वहां नारेबाजी हुई, माहौल गर्म हुआ और कुछ ही देर में भाजपा समर्थकों की भी भीड़ वहां इकट्ठा हो गई। इसके बाद CEO कार्यालय के सामने तनावपूर्ण स्थिति पैदा हो गई थी। इसी घटनाक्रम के बाद अब पुलिस की कार्रवाई और आयोग के निर्देशों ने पूरे मामले को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। दिलचस्प यह भी है कि जिस महिला BLO के खिलाफ अब एफआईआर दर्ज हुई है, उन्होंने पहले इसी घटना को लेकर भाजपा समर्थकों के खिलाफ शिकायत भी दर्ज कराई थी।

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कुल मिलाकर, बंगाल में SIR को लेकर शुरू हुआ प्रशासनिक विवाद अब जांच, कानून और राजनीति—तीनों के केंद्र में आ चुका है। मालदा में न्यायिक अधिकारियों को घेरने की घटना ने जहां NIA जैसी एजेंसी को सक्रिय कर दिया है, वहीं कोलकाता में BLO के खिलाफ दर्ज एफआईआर ने इस विवाद को और संवेदनशील बना दिया है। आने वाले दिनों में एजेंसियों की रिपोर्ट, अदालत की प्रक्रिया और राजनीतिक प्रतिक्रिया—तीनों मिलकर यह तय करेंगे कि बंगाल में SIR विवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है। फिलहाल इतना साफ है कि यह मामला अब केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राज्य की प्रशासनिक स्थिरता और राजनीतिक टकराव का बड़ा मुद्दा बन चुका है।

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